झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक और झारखंड की राजनीति की सबसे बुलंद आवाज़ कहे जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का सोमवार को दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में निधन हो गया। 81 वर्षीय दिशोम गुरु लंबे समय से बीमार चल रहे थे और अंतिम दिनों में वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे। उनके निधन की ख़बर ने पूरे झारखंड समेत देश के करोड़ों लोगों को गमगीन कर दिया है।
यह सिर्फ एक राजनेता का जाना नहीं है, बल्कि झारखंड की उस आवाज़ का शांत हो जाना है, जिसने आदिवासी अधिकारों, सामाजिक न्याय और अलग झारखंड राज्य की लड़ाई को अपनी पूरी जिंदगी समर्पित कर दिया।

बचपन से संघर्ष तक का सफर
1942 में झारखंड के रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन का बचपन कठिनाइयों से भरा था। वे संथाल आदिवासी समुदाय से आते थे, जिनका जीवन अक्सर गरीबी, शोषण और सामाजिक भेदभाव से संघर्ष करता रहा है। पिता की हत्या ने कम उम्र में ही उन्हें समझा दिया था कि अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी होगी।
यही दर्द और अन्याय के अनुभव उनके अंदर सामाजिक बदलाव का बीज बो गए, जो आगे चलकर एक बड़े आंदोलन में बदल गया।
1973 में रखा आंदोलन की नींव: झारखंड मुक्ति मोर्चा
साल 1973 में, उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य था – आदिवासी इलाक़ों के अधिकारों की रक्षा और बिहार से अलग एक नया झारखंड राज्य बनाना।
इस आंदोलन को लोगों का व्यापक समर्थन मिला। धीरे-धीरे शिबू सोरेन का नाम झारखंड के कोने-कोने में गूंजने लगा और लोग उन्हें आदर से ‘दिशोम गुरु’ कहकर पुकारने लगे। दिशोम गुरु का अर्थ होता है – ‘जनजाति के लोगों का नेता’।
तीन दशक का संघर्ष और झारखंड का निर्माण
लगभग तीन दशकों तक चले संघर्ष, रैलियों, आंदोलनों और सरकार पर लगातार दबाव के बाद आखिरकार साल 2000 में झारखंड एक अलग राज्य बना। इस ऐतिहासिक क्षण के केंद्र में शिबू सोरेन की नेतृत्व क्षमता और संघर्ष की अहम भूमिका थी।
झारखंड बनने के बाद शिबू सोरेन राज्य की राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाने लगे और आगे चलकर तीन बार मुख्यमंत्री बने।

राजनीति में उतार-चढ़ाव भरा सफर
1977 में शिबू सोरेन ने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
- 1980 में पहली बार दुमका लोकसभा सीट से संसद पहुंचे।
- फिर 1989, 1991 और 1996 में भी इसी सीट से सांसद चुने गए।
- 2002 में वे राज्यसभा के सदस्य बने।
- 2004, 2009 और 2014 में भी दुमका से लोकसभा चुनाव जीते।
- हालांकि 2019 में बीजेपी के सुनील सोरेन के हाथों उन्हें हार का सामना करना पड़ा, पर इसके बाद भी वे तीसरी बार राज्यसभा के लिए चुने गए।
सिर्फ राज्य की राजनीति तक सीमित नहीं, उन्होंने केंद्र में यूपीए सरकार में कोयला मंत्री के तौर पर भी कार्य किया।
मुख्यमंत्री के रूप में कार्यकाल
शिबू सोरेन तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने।
- पहली बार 2005 में
- दूसरी बार 2008-09 में
- और तीसरी बार 2009-10 में
उनके कार्यकाल को राजनीतिक अस्थिरता और गठजोड़ की राजनीति के दौर में भी आदिवासी हितों की आवाज़ के लिए याद किया जाता है।
धीमे-धीमे राजनीति से दूरी
उम्र और स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से कदम पीछे खींच लिए और झारखंड मुक्ति मोर्चा की कमान अपने बेटे हेमंत सोरेन को सौंप दी। हेमंत सोरेन ने अपने पिता की तरह आदिवासी अधिकारों की आवाज़ बनकर पार्टी का नेतृत्व संभाला और फिलहाल झारखंड के मुख्यमंत्री भी हैं।
अंतिम समय
शिबू सोरेन पिछले कई महीनों से बीमार चल रहे थे। जून के आखिरी सप्ताह में उन्हें दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में भर्ती कराया गया था। हालत बिगड़ने पर उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया, लेकिन सोमवार को उन्होंने अंतिम सांस ली।
उनके बेटे और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन उस समय अस्पताल में ही मौजूद थे। पिता के निधन पर हेमंत ने ‘एक्स’ (पूर्व ट्विटर) पर लिखा:
“आदरणीय दिशोम गुरुजी हम सभी को छोड़कर चले गए हैं। आज मैं शून्य हो गया हूं…”
झारखंड में शोक की लहर
उनके निधन की ख़बर सुनते ही झारखंड के हर जिले, गांव, शहर में शोक की लहर फैल गई। लोग अपने नेता को अंतिम विदाई देने के लिए जमा हो रहे हैं। शिबू सोरेन का पार्थिव शरीर झारखंड लाया जा रहा है, जहां अंतिम संस्कार किया जाएगा।
नेताओं की प्रतिक्रियाएं: देश ने खोया संघर्ष का प्रतीक
देश के बड़े-बड़े नेताओं ने शिबू सोरेन के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया:
- प्रियंका गांधी वाड्रा: “यह हम सभी के लिए बेहद दुखद समाचार है। परिवारजनों के प्रति संवेदनाएं।”
- JDU नेता नीरज कुमार: “उन्होंने आदिवासी समुदाय को राजनीतिक पहचान दी। यह सिर्फ सामाजिक नहीं, बल्कि वैचारिक आंदोलन की भी क्षति है।”
- शिवसेना के संजय राउत: “आदिवासी समाज के लिए वे भगवान जैसे थे।”
- भाजपा नेता रोशन लाल चौधरी: “राज्य के लिए अपूरणीय क्षति है। भगवान उन्हें अपने चरणों में स्थान दें।”
‘दिशोम गुरु’ की विरासत
शिबू सोरेन की सबसे बड़ी विरासत है – उनकी लड़ाई। उन्होंने आदिवासियों को यह भरोसा दिलाया कि उनकी भी आवाज़ है, जो विधानसभा और संसद तक पहुंच सकती है।
अलग झारखंड राज्य बनाना कोई छोटी उपलब्धि नहीं थी। इस प्रक्रिया में न सिर्फ राजनीतिक संघर्ष था, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और वैचारिक स्तर पर भी लंबी लड़ाई थी, जिसका नेतृत्व उन्होंने किया।
अंतिम विदाई, लेकिन स्मृतियों में अमर
भले ही आज दिशोम गुरु हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन झारखंड के पहाड़ों, वनों और आदिवासी गांवों में उनका नाम हमेशा गूंजता रहेगा।
वे सिर्फ एक नेता नहीं थे, बल्कि झारखंड आंदोलन की आत्मा थे, जिन्होंने शोषितों को आवाज़ दी, आदिवासियों को उनका हक दिलाने के लिए जिंदगी भर लड़ाई लड़ी।
भविष्य के लिए सबक
शिबू सोरेन की कहानी आज की पीढ़ी को सिखाती है:
- संघर्ष से कभी डरना नहीं चाहिए।
- असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।
- राजनीति सिर्फ सत्ता के लिए नहीं, बल्कि समाज के सबसे कमजोर तबके के लिए भी होनी चाहिए।
निष्कर्ष
81 वर्ष की उम्र में शिबू सोरेन का जाना झारखंड के लिए ही नहीं, पूरे देश के लिए एक बड़ा नुकसान है। उनकी सादगी, संघर्षशीलता और आदिवासी हितों के लिए अदम्य साहस हमेशा याद रखा जाएगा।
झारखंड की धरती ने भले ही अपना दिशोम गुरु खो दिया हो, लेकिन उनकी सोच, उनका आंदोलन और उनके विचार पीढ़ियों तक जीवित रहेंगे।
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वे दिशोम गुरु की आत्मा को शांति दें और उनके परिवार को इस अपार दुख को सहने की शक्ति दें।