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कर्नाटक बस हड़ताल 2025: KSRTC कर्मचारियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल से जनजीवन ठप, बेंगलुरु मेट्रो बनी सहारा

कर्नाटक में राज्य परिवहन निगमों के कर्मचारियों द्वारा शुरू की गई अनिश्चितकालीन हड़ताल ने राज्यभर में यातायात व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। कर्नाटक स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (KSRTC), बेंगलुरु मेट्रोपोलिटन ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (BMTC), नॉर्थ वेस्ट कर्नाटक रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (NWKRTC), और कल्याण कर्नाटक रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (KKRTC) के कर्मचारियों द्वारा चल रही इस हड़ताल से हजारों यात्री प्रभावित हो रहे हैं।

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इस हड़ताल का सबसे बड़ा असर बेंगलुरु में देखने को मिला, जहां लोग बसों के विकल्प के तौर पर नम्मा मेट्रो की ओर रुख कर रहे हैं। प्रमुख मेट्रो स्टेशनों, विशेष रूप से मैजेस्टिक मेट्रो स्टेशन पर भारी भीड़ देखी जा रही है।

हड़ताल का कारण: वेतन वृद्धि और बकाया भुगतान की मांग

परिवहन निगमों के कर्मचारियों की इस हड़ताल की मुख्य वजह दो प्रमुख मांगें हैं:

  1. वर्तमान मूल वेतन पर 25% की बढ़ोतरी।
  2. 38 महीनों का बकाया भुगतान, जिसकी अनुमानित राशि लगभग ₹1,800 करोड़ है।

कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने महामारी और कठिन वित्तीय परिस्थितियों के दौरान भी बिना रुके काम किया है और अब उनका यह हक बनता है कि उन्हें पूर्ण बकाया राशि और उचित वेतन वृद्धि दी जाए।

सरकार और यूनियन के बीच टकराव

2 अगस्त को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की अध्यक्षता में कर्मचारियों और अधिकारियों के साथ एक बैठक हुई। बैठक में परिवहन मंत्री रामलिंगा रेड्डी, मुख्य सचिव शालिनी राजनेश सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे।

सरकार ने यूनियन को यह प्रस्ताव दिया कि वे 14 महीनों का बकाया तुरंत देने को तैयार हैं और पहले से घोषित 15% वेतन वृद्धि को लागू करेंगे। लेकिन यूनियन नेताओं ने इसे अस्वीकार करते हुए पूरी 38 महीनों की राशि और 25% वेतन वृद्धि की मांग दोहराई।

एच.वी. अनंता सुब्बाराव, कर्नाटक स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन स्टाफ एंड वर्कर्स फेडरेशन के अध्यक्ष ने कहा:

“हमने 38 महीनों तक काम किया है। यह कोई नया बोझ नहीं है बल्कि हमारा हक है।”

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस मांग को “अत्यधिक” बताते हुए कहा कि राज्य की परिवहन निगमों की वित्तीय स्थिति बहुत खराब है और इस समय इतनी बड़ी राशि देना संभव नहीं है।

बस सेवा पर सीधा असर

बेंगलुरु में स्थिति:

  • BMTC की अधिकांश बसें बंद पड़ी हैं, जिससे आम यात्रियों को भारी असुविधा हो रही है।
  • नम्मा मेट्रो एकमात्र प्रमुख विकल्प बन गया है। मैजेस्टिक, इंदिरानगर, यशवंतपुर, और राजाजीनगर जैसे स्टेशनों पर भीड़ का आलम यह है कि मेट्रो प्रबंधन को विशेष प्रबंध करने पड़े।
  • शिवाजीनगर बस स्टैंड से कुछ सीमित संख्या में बसें चलीं, लेकिन वह पर्याप्त नहीं थीं।

राज्य के अन्य शहरों में स्थिति:

हड़ताल का असर केवल बेंगलुरु तक सीमित नहीं है। हुबली, धारवाड़, दावणगेरे, मांड्या, रामनगर, तुमकुर, बागलकोट, और बेलगावी जैसे शहरों में बस सेवाएं लगभग ठप हैं। खासतौर से:

  • कल्याण कर्नाटक और उत्तर-पश्चिम कर्नाटक क्षेत्रों की ओर जाने वाली सभी बस सेवाएं बंद हैं।
  • अंतरराज्यीय (inter-state) और अंतरजिला (intra-state) यात्राएं लगभग पूरी तरह से प्रभावित हुई हैं।
  • कई यात्री बस अड्डों पर फंसे हुए हैं या वैकल्पिक साधनों जैसे टैक्सी, प्राइवेट बस या ऑटो की तलाश में हैं।

सरकार का कदम: IT कंपनियों के लिए वर्क फ्रॉम होम की सिफारिश

CREDIT IMAGE PFJ

इस संकट के बीच सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी विभाग को निर्देश दिया है कि वे विशेषकर बेंगलुरु स्थित निजी IT कंपनियों से कहें कि वे अपने कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम की सुविधा दें।

डॉ. एनवी प्रसाद, परिवहन विभाग के प्रधान सचिव ने 2 अगस्त को एक पत्र जारी कर इस बात की पुष्टि की। उन्होंने कहा:

“हम यह सलाह इसलिए दे रहे हैं ताकि सार्वजनिक परिवहन पर दबाव कम हो और आम जनता को राहत मिल सके।”

यूनियन की दलील: “यह हमारा अधिकार है, एहसान नहीं”

यूनियन नेताओं का मानना है कि यह कोई नई मांग नहीं है, बल्कि उनकी पुरानी देनदारी है जिसे सरकार ने टाल रखा है। उनका कहना है कि जब उन्होंने लगातार 38 महीने तक सेवाएं दीं, तब उन्हें भी सरकार से समान निष्ठा की उम्मीद है।

कर्मचारियों का कहना है कि सरकार पहले ही जनवरी 2022 से फरवरी 2023 तक के बकाये को स्वीकार कर चुकी है, फिर अब पूरा भुगतान देने में क्या परेशानी है?

मुख्यमंत्री की आपत्ति: “तर्कसंगत नहीं हैं मांगे”

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने यूनियन की मांगों को अवास्तविक बताते हुए कहा कि:

  • राज्य सरकार ने पहले ही वित्तीय सहायता प्रदान की है।
  • निगमों की हालत पहले से ही घाटे में है।
  • पूरी 38 महीनों की राशि देना संभव नहीं है।

हालांकि, उन्होंने कहा कि सरकार वार्ता के लिए अब भी तैयार है और एक संतुलित समाधान निकालने की कोशिश जारी रहेगी।

जनता का आक्रोश और सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया

जहां एक ओर यूनियन अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रही है, वहीं आम जनता इस हड़ताल से बुरी तरह प्रभावित हो रही है। सोशल मीडिया पर लोग सरकार और यूनियन, दोनों से नाराजगी जता रहे हैं:

  • ट्विटर पर #KSRTCStrike, #BMTCStrike और #NammaMetro ट्रेंड कर रहे हैं।
  • यात्रियों ने भारी भीड़, टिकट काउंटरों की लंबी कतारों और ऑटो/टैक्सी चालकों द्वारा मनमाने किराये वसूलने की शिकायतें की हैं।

विशेषज्ञों की राय: “मध्य मार्ग जरूरी”

ट्रांसपोर्ट सेक्टर के विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार और यूनियन दोनों को बीच का रास्ता निकालना होगा:

  • कर्मचारियों की मांगें पूरी तरह से नाजायज नहीं हैं, लेकिन राज्य की वित्तीय हालत को देखते हुए किस्तों में भुगतान संभव हो सकता है।
  • सरकार को एक स्थायी वेतन नीति पर काम करना चाहिए, जिससे हर कुछ सालों में ऐसे गतिरोध ना पैदा हों।

भविष्य की राह: क्या समाधान निकलेगा?

अब सवाल यह है कि क्या सरकार और यूनियन किसी ठोस समझौते पर पहुंच पाएंगे? जब तक कोई समाधान नहीं निकलता, तब तक:

  • बस सेवाएं ठप रहेंगी।
  • मेट्रो और अन्य विकल्पों पर दबाव बना रहेगा।
  • आम जनता को असुविधा झेलनी पड़ेगी।

सरकार ने संकेत दिया है कि वार्ता के लिए दरवाजे खुले हैं, लेकिन अंतिम निर्णय यूनियन की सहमति पर निर्भर करेगा।


निष्कर्ष

कर्नाटक में चल रही परिवहन हड़ताल न केवल एक आर्थिक मुद्दा है, बल्कि यह सरकारी कर्मचारियों की उपेक्षा, वित्तीय पारदर्शिता और नीति निर्धारण की जटिलताओं को भी उजागर करती है। जहां एक ओर कर्मचारियों का संघर्ष जायज है, वहीं दूसरी ओर जनता की असुविधा को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और यूनियन नेताओं के बीच आगे की बातचीत क्या रुख लेती है और क्या कर्नाटक एक बार फिर से सामान्य यातायात व्यवस्था की ओर लौट पाएगा या नहीं।

Manoj kumar Singh

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