Bus strike in karnataka
कर्नाटक में राज्य परिवहन निगमों के कर्मचारियों द्वारा शुरू की गई अनिश्चितकालीन हड़ताल ने राज्यभर में यातायात व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। कर्नाटक स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (KSRTC), बेंगलुरु मेट्रोपोलिटन ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (BMTC), नॉर्थ वेस्ट कर्नाटक रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (NWKRTC), और कल्याण कर्नाटक रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (KKRTC) के कर्मचारियों द्वारा चल रही इस हड़ताल से हजारों यात्री प्रभावित हो रहे हैं।
इस हड़ताल का सबसे बड़ा असर बेंगलुरु में देखने को मिला, जहां लोग बसों के विकल्प के तौर पर नम्मा मेट्रो की ओर रुख कर रहे हैं। प्रमुख मेट्रो स्टेशनों, विशेष रूप से मैजेस्टिक मेट्रो स्टेशन पर भारी भीड़ देखी जा रही है।
परिवहन निगमों के कर्मचारियों की इस हड़ताल की मुख्य वजह दो प्रमुख मांगें हैं:
कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने महामारी और कठिन वित्तीय परिस्थितियों के दौरान भी बिना रुके काम किया है और अब उनका यह हक बनता है कि उन्हें पूर्ण बकाया राशि और उचित वेतन वृद्धि दी जाए।
2 अगस्त को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की अध्यक्षता में कर्मचारियों और अधिकारियों के साथ एक बैठक हुई। बैठक में परिवहन मंत्री रामलिंगा रेड्डी, मुख्य सचिव शालिनी राजनेश सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे।
सरकार ने यूनियन को यह प्रस्ताव दिया कि वे 14 महीनों का बकाया तुरंत देने को तैयार हैं और पहले से घोषित 15% वेतन वृद्धि को लागू करेंगे। लेकिन यूनियन नेताओं ने इसे अस्वीकार करते हुए पूरी 38 महीनों की राशि और 25% वेतन वृद्धि की मांग दोहराई।
एच.वी. अनंता सुब्बाराव, कर्नाटक स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन स्टाफ एंड वर्कर्स फेडरेशन के अध्यक्ष ने कहा:
“हमने 38 महीनों तक काम किया है। यह कोई नया बोझ नहीं है बल्कि हमारा हक है।”
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस मांग को “अत्यधिक” बताते हुए कहा कि राज्य की परिवहन निगमों की वित्तीय स्थिति बहुत खराब है और इस समय इतनी बड़ी राशि देना संभव नहीं है।
हड़ताल का असर केवल बेंगलुरु तक सीमित नहीं है। हुबली, धारवाड़, दावणगेरे, मांड्या, रामनगर, तुमकुर, बागलकोट, और बेलगावी जैसे शहरों में बस सेवाएं लगभग ठप हैं। खासतौर से:
इस संकट के बीच सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी विभाग को निर्देश दिया है कि वे विशेषकर बेंगलुरु स्थित निजी IT कंपनियों से कहें कि वे अपने कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम की सुविधा दें।
डॉ. एनवी प्रसाद, परिवहन विभाग के प्रधान सचिव ने 2 अगस्त को एक पत्र जारी कर इस बात की पुष्टि की। उन्होंने कहा:
“हम यह सलाह इसलिए दे रहे हैं ताकि सार्वजनिक परिवहन पर दबाव कम हो और आम जनता को राहत मिल सके।”
यूनियन नेताओं का मानना है कि यह कोई नई मांग नहीं है, बल्कि उनकी पुरानी देनदारी है जिसे सरकार ने टाल रखा है। उनका कहना है कि जब उन्होंने लगातार 38 महीने तक सेवाएं दीं, तब उन्हें भी सरकार से समान निष्ठा की उम्मीद है।
कर्मचारियों का कहना है कि सरकार पहले ही जनवरी 2022 से फरवरी 2023 तक के बकाये को स्वीकार कर चुकी है, फिर अब पूरा भुगतान देने में क्या परेशानी है?
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने यूनियन की मांगों को अवास्तविक बताते हुए कहा कि:
हालांकि, उन्होंने कहा कि सरकार वार्ता के लिए अब भी तैयार है और एक संतुलित समाधान निकालने की कोशिश जारी रहेगी।
जहां एक ओर यूनियन अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रही है, वहीं आम जनता इस हड़ताल से बुरी तरह प्रभावित हो रही है। सोशल मीडिया पर लोग सरकार और यूनियन, दोनों से नाराजगी जता रहे हैं:
ट्रांसपोर्ट सेक्टर के विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार और यूनियन दोनों को बीच का रास्ता निकालना होगा:
अब सवाल यह है कि क्या सरकार और यूनियन किसी ठोस समझौते पर पहुंच पाएंगे? जब तक कोई समाधान नहीं निकलता, तब तक:
सरकार ने संकेत दिया है कि वार्ता के लिए दरवाजे खुले हैं, लेकिन अंतिम निर्णय यूनियन की सहमति पर निर्भर करेगा।
कर्नाटक में चल रही परिवहन हड़ताल न केवल एक आर्थिक मुद्दा है, बल्कि यह सरकारी कर्मचारियों की उपेक्षा, वित्तीय पारदर्शिता और नीति निर्धारण की जटिलताओं को भी उजागर करती है। जहां एक ओर कर्मचारियों का संघर्ष जायज है, वहीं दूसरी ओर जनता की असुविधा को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और यूनियन नेताओं के बीच आगे की बातचीत क्या रुख लेती है और क्या कर्नाटक एक बार फिर से सामान्य यातायात व्यवस्था की ओर लौट पाएगा या नहीं।
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